भर्ती कब ज़रूरी होती है
भर्ती का फ़ैसला बीमारी के नाम से नहीं, बल्कि हालत की गंभीरता और सुरक्षा को देखकर होता है। डॉक्टर आमतौर पर इन हालात में भर्ती की सलाह देते हैं:
- गंभीर डिप्रेशन, जिसमें व्यक्ति अपनी जान लेने की बात करे, योजना बनाए या कोशिश कर चुका हो
- मेनिया, जिसमें व्यक्ति कई दिन न सोए, बेहिसाब ख़र्च करे, झगड़े करे या ख़तरनाक काम करने लगे
- साइकोसिस, जिसमें आवाज़ें सुनाई देना, गहरा शक या भ्रम व्यक्ति को अपने या दूसरों के लिए असुरक्षित बना दें
- शराब या किसी दूसरे नशे को छोड़ते समय गंभीर विड्रॉल, जैसे तेज़ कँपकँपी, भ्रम या दौरे पड़ने का ख़तरा
- कई दिनों तक खाना-पानी छोड़ देना, या शरीर का बहुत कमज़ोर हो जाना
- जब घर पर सुरक्षित देखभाल संभव न हो, या घर से आते-जाते इलाज से फ़ायदा न हो रहा हो
भर्ती कहाँ और कैसे होती है
डॉ. सुरभि माथुर नारायणा हॉस्पिटल, प्रताप नगर, जयपुर में कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट हैं। जब किसी मरीज़ को भर्ती की ज़रूरत होती है, तो उसकी व्यवस्था नारायणा हॉस्पिटल में की जाती है, इसलिए इलाज उसी मनोचिकित्सक की देखरेख में जारी रहता है जो मरीज़ की पूरी बात पहले से जानती हैं।
ज़्यादातर मामलों में भर्ती का फ़ैसला पहले से तय परामर्श में होता है: डॉक्टर हालत देखती हैं, परिवार से बात करती हैं, और समझाती हैं कि भर्ती क्यों सुझाई जा रही है और उससे क्या उम्मीद करें। आने से पहले क्लिनिक को फ़ोन करके हॉस्पिटल में डॉ. माथुर के परामर्श का समय पक्का कर लें। इमरजेंसी में इंतज़ार न करें, सीधे नज़दीकी इमरजेंसी विभाग जाएँ।
भर्ती के दौरान इलाज में दवाएँ, रोज़ की जाँच, ज़रूरत हो तो ब्लड टेस्ट और दूसरे विशेषज्ञों की राय, बातचीत और परिवार के साथ बैठकें शामिल हो सकती हैं। लक्ष्य यह होता है कि व्यक्ति सुरक्षित रहे, लक्षण जल्दी काबू में आएँ और घर लौटने की तैयारी हो।
मरीज़ की सहमति और अधिकार
भारत में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 मानसिक बीमारी वाले हर व्यक्ति के सम्मान और अधिकारों की रक्षा करता है। जहाँ तक संभव हो, भर्ती और इलाज मरीज़ की अपनी सहमति से होता है, और उसे अपने इलाज के बारे में साफ़ जानकारी पाने का हक़ है।
कभी-कभी बीमारी इतनी गंभीर होती है कि व्यक्ति उस समय अपने इलाज का फ़ैसला ख़ुद नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति के लिए क़ानून में एक तय प्रक्रिया है, जिसमें परिवार या व्यक्ति के नामित प्रतिनिधि (नॉमिनेटेड रिप्रेज़ेंटेटिव) की भूमिका होती है, और मरीज़ के अधिकारों की सुरक्षा के नियम भी। डॉक्टर परिवार को यह प्रक्रिया समझाते हैं; कोई बात समझ न आए तो पूछने में संकोच न करें।
हालत सुधरने पर व्यक्ति से फिर उसकी राय ली जाती है, और इलाज के हर कदम में उसे जितना हो सके शामिल रखा जाता है।
साथ क्या लाएँ और परिवार की भूमिका
दूसरे ज़िले से आ रहे हों तो भर्ती के लिए पहले से तैयारी कर लें। परिवार के किसी एक सदस्य का जयपुर में रुक पाना बहुत मदद करता है: डॉक्टर उनसे रोज़ की प्रगति पर बात कर सकते हैं, और ज़रूरी फ़ैसलों और कागज़ी काम में परिवार की ज़रूरत पड़ती है। मरीज़ के साथ कौन रुक सकता है और मिलने का समय क्या है, ये नियम भर्ती के समय अस्पताल से ही पूछ लें।
- पहचान पत्र, और अगर हो तो स्वास्थ्य बीमा का कार्ड या पॉलिसी के कागज़
- सभी पुरानी पर्चियाँ, डिस्चार्ज समरी और जाँच की रिपोर्ट
- चल रही सभी दवाएँ उनके पत्तों या डिब्बों के साथ, शुगर या ब्लड प्रेशर जैसी दूसरी बीमारियों की दवाओं समेत
- कुछ दिनों के आरामदायक कपड़े, चप्पल और रोज़ की ज़रूरत का सामान
- परिवार के दो लोगों के फ़ोन नंबर, जिनसे अस्पताल कभी भी बात कर सके
भर्ती कितने दिन की होती है, और ख़र्च
भर्ती की अवधि हर व्यक्ति में अलग होती है: शराब छुड़ाने के डिटॉक्स में अक्सर लगभग एक हफ़्ता, और गंभीर डिप्रेशन, मेनिया या साइकोसिस में कुछ दिनों से लेकर कुछ हफ़्तों तक। लक्ष्य पूरी तरह ठीक होने तक अस्पताल में रखना नहीं, बल्कि हालत को इतना स्थिर करना है कि बाकी इलाज घर से आते-जाते सुरक्षित रूप से चल सके।
ख़र्च के बारे में अस्पताल से पहले ही जानकारी ले लें। अगर आपके पास स्वास्थ्य बीमा है, तो बीमा कंपनी से पक्का कर लें कि मानसिक बीमारी के लिए भर्ती आपकी पॉलिसी में कैसे कवर होती है। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के बाद स्वास्थ्य बीमा में मानसिक बीमारी को भी शामिल किया जाना अपेक्षित है, लेकिन हर पॉलिसी की शर्तें अलग हो सकती हैं।
छुट्टी के बाद
डिस्चार्ज के समय डिस्चार्ज समरी और दवाओं की सूची ज़रूर ले लें, और अगली मुलाकात की तारीख़ पक्की कर लें। इन कागज़ों को सँभालकर रखें और हर फ़ॉलो-अप में साथ लाएँ। छुट्टी के बाद के पहले कुछ हफ़्ते बहुत अहम होते हैं, इसलिए शुरुआत में फ़ॉलो-अप जल्दी-जल्दी रखे जाते हैं।
घर पर दवाएँ ठीक समय पर और पूरी ख़ुराक में दें, और बेहतर महसूस होने पर भी अपने आप बंद न करें। अगर फिर से नींद बिगड़ने लगे, चिड़चिड़ापन, शक या उदासी लौटे, या दवा का कोई परेशान करने वाला असर दिखे, तो अगली तारीख़ का इंतज़ार किए बिना क्लिनिक को फ़ोन करें।
अगर किसी की जान को ख़तरा हो तो 112 पर कॉल करें या तुरंत नज़दीकी इमरजेंसी विभाग जाएँ। सलाह के लिए भारत सरकार की निःशुल्क 24×7 हेल्पलाइन टेली-मानस: 14416।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। आपके या आपके परिवार के लिए सही इलाज डॉक्टर से मिलकर ही तय होता है। चिकित्सा अस्वीकरण
