क्या इन दवाओं की आदत पड़ जाती है?
ज़्यादातर नहीं। डिप्रेशन, चिंता, OCD और कई दूसरी समस्याओं में दी जाने वाली एंटीडिप्रेसेंट दवाएँ, और मूड को स्थिर रखने वाली या साइकोसिस की दवाएँ, नशे की तरह आदत नहीं बनातीं। इनसे ‘नशा’ नहीं होता और समय के साथ ख़ुराक बढ़ाते रहने की तलब नहीं लगती।
कुछ नींद और घबराहट की दवाएँ, जैसे बेंज़ोडायज़ेपीन समूह की दवाएँ, लंबे समय तक लेने पर आदत बना सकती हैं। इसलिए डॉक्टर इन्हें आमतौर पर कम समय के लिए और निगरानी में देते हैं, और बंद करते समय धीरे-धीरे कम करते हैं। ऐसी दवाएँ किसी और की पर्ची से या केमिस्ट से अपने आप लेकर कभी न खाएँ।
एक बात समझना ज़रूरी है: अगर कोई दवा अचानक बंद करने पर कुछ दिन तकलीफ़ हो, तो इसका मतलब हमेशा आदत नहीं होता। कई दवाओं को धीरे-धीरे कम करके बंद किया जाता है, ताकि शरीर को बदलाव के लिए समय मिले।
क्या दवा ज़िंदगी भर चलेगी?
यह बीमारी और व्यक्ति पर निर्भर करता है। डिप्रेशन या चिंता के पहले दौर में अक्सर ठीक होने के बाद भी कुछ महीनों तक दवा जारी रखी जाती है, ताकि बीमारी लौटे नहीं, और फिर डॉक्टर की देखरेख में धीरे-धीरे कम की जाती है।
बाइपोलर डिसऑर्डर, स्किज़ोफ़्रेनिया या बार-बार लौटने वाले डिप्रेशन जैसी कुछ बीमारियों में लंबे समय तक दवा की ज़रूरत पड़ सकती है, ठीक वैसे ही जैसे शुगर या ब्लड प्रेशर में। लंबे समय तक दवा लेने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति सामान्य ज़िंदगी नहीं जी सकता; सही इलाज के साथ बहुत से लोग पढ़ाई, नौकरी और परिवार सब सँभालते हैं।
हर फ़ॉलो-अप में डॉक्टर देखती हैं कि दवा की ज़रूरत अब भी है या नहीं, और ख़ुराक कम की जा सकती है या नहीं। यह सवाल खुलकर पूछें।
दवा अपने आप बंद या कम न करें
बेहतर महसूस होने पर दवा बंद कर देना सबसे आम ग़लती है। अक्सर व्यक्ति दवा की वजह से ही ठीक महसूस कर रहा होता है, और अचानक बंद करने से बीमारी लौट सकती है, कभी-कभी पहले से ज़्यादा तेज़ी से। कुछ दवाओं को अचानक छोड़ने पर बेचैनी, चक्कर, नींद न आना या दूसरे लक्षण भी हो सकते हैं।
रिश्तेदारों, पड़ोसियों या इंटरनेट की सलाह पर ख़ुराक न बदलें। अगर आपको लगता है कि दवा ज़्यादा है, असर नहीं कर रही या कोई साइड इफ़ेक्ट परेशान कर रहा है, तो डॉक्टर से बात करें; ज़रूरत हो तो ख़ुराक या दवा बदली जा सकती है।
अगर कभी एक ख़ुराक छूट जाए, तो अगली ख़ुराक दोगुनी न लें। छूटी ख़ुराक के बारे में डॉक्टर ने जो बताया हो वही करें, या शक हो तो क्लिनिक से पूछ लें।
साइड इफ़ेक्ट: क्या आम है और कब बताएँ
शुरुआती दिनों में कुछ लोगों को नींद आना, जी मिचलाना, सिर भारी लगना, मुँह सूखना या भूख में बदलाव महसूस होता है। ऐसे ज़्यादातर असर कुछ दिनों से दो-तीन हफ़्तों में कम हो जाते हैं। कई दवाएँ अपना पूरा फ़ायदा दिखाने में दो से छह हफ़्ते लेती हैं, इसलिए पहले हफ़्ते में फ़र्क न दिखे तो निराश न हों।
कुछ दवाओं का वज़न या शुगर पर असर पड़ सकता है, इसलिए डॉक्टर ज़रूरत के अनुसार वज़न और ब्लड टेस्ट की जाँच करवाती हैं।
इनमें से कोई भी लक्षण दिखे, तो अगली तारीख़ का इंतज़ार किए बिना तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें या नज़दीकी इमरजेंसी विभाग जाएँ:
- चकत्ते, चेहरे या होंठों पर सूजन, या साँस लेने में तकलीफ़
- बहुत ज़्यादा बेचैनी, शरीर में अकड़न या असामान्य हरकतें
- तेज़ बुख़ार के साथ भ्रम या मांसपेशियों में जकड़न
- अपनी जान लेने या ख़ुद को नुकसान पहुँचाने के नए या बढ़ते विचार
शराब, गर्भावस्था और दूसरी बीमारियाँ
दवाओं के साथ शराब पीने से नींद और सुस्ती बहुत बढ़ सकती है, दवा का असर कम हो सकता है और डिप्रेशन या चिंता बिगड़ सकती है। इलाज के दौरान शराब से दूर रहना सबसे सुरक्षित है; अगर छोड़ना मुश्किल लगे तो यह बात भी डॉक्टर को बताएँ, क्योंकि इसका भी इलाज है।
अगर आप गर्भवती हैं, गर्भ की योजना बना रही हैं या बच्चे को दूध पिलाती हैं, तो यह डॉक्टर को ज़रूर बताएँ। कई दवाएँ इस दौरान भी सावधानी से दी जा सकती हैं, लेकिन अपने आप दवा अचानक बंद करना माँ और बच्चे दोनों के लिए जोखिम भरा हो सकता है, इसलिए फ़ैसला डॉक्टर के साथ मिलकर लें।
शुगर, ब्लड प्रेशर, थायरॉइड, दिल, लिवर या किडनी की बीमारी हो, या आप कोई दूसरी दवा, आयुर्वेदिक दवा या घरेलू नुस्ख़ा ले रहे हों, तो यह भी बताएँ, ताकि दवाएँ आपस में टकराएँ नहीं।
जयपुर से दूर रहते हुए दवाएँ नियमित कैसे लें
दूसरे ज़िलों में रहने वाले मरीज़ों के लिए सबसे बड़ी चुनौती दवा का बिना रुके चलना है। पर्ची की एक फ़ोटो फ़ोन में रख लें, और दवा ख़त्म होने से कुछ दिन पहले ही अगली दवाएँ ले आएँ। अगर आपके शहर में कोई दवा न मिले, तो उसकी जगह अपने आप दूसरी दवा न लें; क्लिनिक से पूछ लें।
रोज़ एक ही समय पर दवा लें, जैसे खाने के बाद या सोने से पहले; परिवार का कोई सदस्य याद दिला सकता है, ख़ासकर बुज़ुर्गों और बहुत बीमार लोगों में। दवाएँ बच्चों की पहुँच से दूर रखें।
हर फ़ॉलो-अप में दवाओं के पत्ते या डिब्बे साथ लाएँ। इससे डॉक्टर देख पाती हैं कि आप असल में कौन-सी दवा और कितनी ख़ुराक ले रहे हैं, क्योंकि अलग-अलग कंपनियों की एक ही दवा के नाम अलग-अलग हो सकते हैं।
अगर किसी की जान को ख़तरा हो तो 112 पर कॉल करें या तुरंत नज़दीकी इमरजेंसी विभाग जाएँ। सलाह के लिए भारत सरकार की निःशुल्क 24×7 हेल्पलाइन टेली-मानस: 14416।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। आपके या आपके परिवार के लिए सही इलाज डॉक्टर से मिलकर ही तय होता है। चिकित्सा अस्वीकरण
